आनन्द का मूल स्रोत

काल के अनुरूप समाज में परिवर्तन होते रहे हैं और होते रहेंगे, यह एक अनवरत यात्रा है जो सृष्टि के आदि से अंत तक चलती रहेगी। ठहराव सृष्टि के विपरीत है और यह आने वाला नहीं है। कोई कितना ही विद्वान या सिद्ध पुरुष क्यों न हो, यह समाज और जीवन छोड़कर उसे अनन्त यात्रा पर निकलना ही होगा। यही सृष्टि का विधान है। इस विधान को समझे बिना, मुनष्य नाम का प्राणी अपने होने को शाश्वत और शक्तिशाली मान लेता है। इस मान्यता से अहंकार पैदा होता है और यह अहंकार मनुष्य को इतना छोटा बना देता है कि वह सृष्टि के विराट सत्य को देखने में असमर्थ हो जाता है। यह असमर्थता संसार में चारों ओर दिखाई देती है। जब विज्ञ पुरुष इसे देखता है तो उसमें करुणा का आविर्भाव होता है। यह करुणा ही धर्म की जननी है। इस करुणा से ही संसार में प्रेम की उत्पत्ति हुई है। इस प्रेम से ही संसार सुन्दर हुआ है। इस सुन्दरता का मूल सृष्टि के स्रोत से जुड़ा है। इस स्रोत की खोज ही संसार की सबसे बड़ी खोज है। मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम लोग जो कुछ भी करते हैं उसमें ‘मैं’ अहंकार सदैव उपस्थित रहता है। अपने सभी प्रयास ‘मैं’ को ही मजबूत करते हैं। यही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। हमारे कर्त्ताभाव से हमारा अहंकार मजबूत होता है। आध्यात्मिक साधना का तात्पर्य व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विसर्जन और निजत्व की स्थापना है। निजत्व जन्मजात होता है और व्यक्तित्व व्यवहार से निर्मित होता है। अन्ततः हमें अपने निजत्व में ही स्थिर होना है और यही सृष्टि का मूल स्रोत है। यही आनन्द का मूल स्रोत