ज्ञान और धन के मध्य संतुलन

भारत में युगों से ऐसी अवधारणा प्रचलित है कि ज्ञानवान् धनपति नहीं हो पाते व धनपति ज्ञानवान् नहीं हो पाते। पर यह धारणा उतनी सही नहीं है जितनी ऊपर से दिखाई देती है।
यह वस्तुतः चुनाव का प्रश्न है। मानव अपनी रुचि, प्रवृत्ति, वृत्ति और वरीयताओं के भार से तथा प्राथमिकताओं के प्रहार से प्रचालित होते हैं। जबकि सही जीवन प्रक्रिया है कि प्रत्येक को अत्यन्त सूक्ष्म व तार्किक वृत्ति द्वारा अपनी रुचि, प्रकृति, प्रवृत्ति व वरीयताओं और प्राथमिकताओं को जांच कर, परीक्षण कर उन्हें स्वीकार या वर्जित करने का अभ्यास करना चाहिए। ज्ञान पिपासु दिखाई देने वाले लोग सत्य ज्ञान प्राप्ति पर तो श्रम कम करते हैं, ज्ञान प्रदर्शन तथा प्रतिष्ठा पर ध्यान अधिक होने से वे असुंलित हो जाते हैं। अन्यथा ज्ञानार्जन सिर्फ ज्ञानार्जन के लिए तथा आत्म-विकास के लिए हो तो वह सीमित और व्यवस्थित रहता है।
इसी प्रकार धनेच्छुक व्यापार बुद्धि लोग धन-प्रतिष्ठा, सुरक्षा, आनन्द विलास की प्राथमिकताओं के कारण धनोपार्जन पर असंतुलित व अवांछनीय समय-श्रम तथा बुद्धि का व्यय करते हैं। उनमें ज्ञान पिपासा हो भी तो उसे दबाने की चेष्टा करते हैं या उसे धनोपार्जन से कम महत्त्व देते हैं। परन्तु प्रतिष्ठा, यश, अहंवृद्धि की दृष्टि से किया गया, न तो धनोपार्जन ही श्रेष्ठ है और न ज्ञान अभ्यास ही विशेष उपयोगी है। तब जो भी होता है वह मनोवैज्ञानिक विकृति तथा आध्यात्मिक विनाश का ही कारण बनता है। ज्ञान अभ्यासी धन कमाने में इसलिए पिछड़ते हैं कि एक तो उनमें अहंभाव, स्व-महत्त्व का भाव अधिक तीव्र होता है। वे प्रायः ही स्वयं को जनत्राता, जनमार्ग दर्शक तथा सामान्य जन से श्रेष्ठ मानने का भाव रखते हैं। इस कारण व्यावहारिकता तथा भांति भांति के व्यापारिक प्रयोग सीख पाने में रुचि और अवसर दोनों को क्षीण करते रहते हैं। इस स्थिति में अपने ज्ञान को ही आय का साधन बनाते हैं, तो न तो ज्ञान ही शुद्ध रह पाता है और न उपयुक्त समृद्धि ही आ पाती है। इस आत्मतृप्ति के भ्रम में ज्ञानाभ्यासी जीता है।
इसी प्रकार धनपति विलासोन्मुखता, समाज व क्षेत्र में महत्त्व तथा पीढ़ियों के संरक्षण के निमित्त, नाम व यश के निमित्त, प्रमुखता व मुख्यतः पाने के निमित्त ज्ञानार्जन को पीछे सरकाता रहता है। एक आत्म तुष्टि का गहन भाव धनिकों के मन में प्रायः देखने में आता है।
जीवन का लक्ष्य यदि सृष्टि के हेतु तथा अपने हेतु को जानना, पहचानना और उस ओर प्रगति करना है तो ज्ञान और सम्पत्ति दोनों की ओर एक संतुलित वृत्ति अपनानी होगी। ज्ञान को धन से कुछ अधिक ही महत्त्व देना होगा। क्योंकि ज्ञान मानव के भीतर के अंधकार को विनष्ट करने का बड़ा साधन है। धन, ज्ञानाभ्यासी के पथ को सरल, सह्य व साधन सम्पन्न बनाता है। अतः धन को साधन बनाना चाहिए ज्ञानार्जन का तथा ज्ञानार्जन को साधन बनाना चाहिए जीवन और जगत् के हेतु को जानने का। इस प्रकार मधुराधिमधुर सरस्वती एवं सुलक्षण सम्पन्ना लक्ष्मी, दोनों कूलों तक एक सुन्दर सेतु का निर्माण किया जा सकता है।