हम विवश हैं बधाई देने के लिए
जब समाज अपने पुराने मूल्यों को उतारकर नए मूल्य धारण करता है तो एक बार समाज में उहापोह की स्थिति पैदा होती है। आज का हिन्दू सम्प्रदाय स्वयं को नए सिरे से गढ़ने का प्रयास कर रहा है और इस प्रयास में राजनीति का पूरा पूरा हस्तक्षेप दिखाई देता है। पूर्व कालों में धर्म ही राजनीति को मार्ग देता था, लेकिन आज राजनीति धर्म को अपने हिसाब से परिभाषित कर रही है और उसे दिशा देने की कोशिश भी कर रही है। जब समाज धर्मनीति से चलता है तो समाज में समरसता और सद्भावना का वातावरण बना रहता है, फिर सत्ता किसी की भी क्यों न हो! सत्ता से कभी धर्म संचालित नहीं होता है और जब ऐसा होने लगे, समझो सामाजिक सद्भाव और समरसता के दिन चले गये और समाज में निरन्तर विघटन, वैमनस्य, घृणा और हिंसा का वातावरण बनने लगता है। क्योंकि राजनीति ऐसा दुष्चक्र है जो मनुष्य को मनुष्य होने से वंचित कर देता है। राजनीति ऐसा जंगल है जो समाज को अनियोजित हिंसा की ओर धकेल देता है, जहां एक दूसरे को गिराना ही मकसद होता है। दुर्भाग्य से आज हमारे देश में सत्ता ने कुछ ऐसा ही महौल विकसित कर रखा है, जहाँ हिंसा को सबसे अहम स्थान मिलता दिखाई दे रहा है, क्योंकि सत्ता निरंकुश और लुटेरी होती है। जिस लोकतंत्र की बात पश्चिमी देश करते हैं, उनके हिसाब से तो आज बहुत सही दिशा दिखाई जा रही है। लेकिन मनुष्य के मौलिक अधिकार और जीवन की बुनियादी स्वतंत्रता का आज हनन हो रहा है। लोकतंत्र से लोक सदा के लिए विलुप्त हो गया है और तंत्र शेष रहा है। यह तंत्र अपने-अपने हिसाब से समाज और धर्म को परिभाषित कर रहा है। न केवल परिभाषित कर रहा है वरन उसकी दिशा भी तय कर रहा है। इसके लिए यदि उसे अधिसंख्य नागरिकों को देशद्रोही सिद्ध करना पड़े तो यह सत्ता संकोच नहीं करती है। सत्ता का बुनियादी चरित्र ही शायद ऐसा होता है, इसलिए ही तो देश के सबसे बड़े देश भक्त आज सत्तासीन हैं और वही सब कर रहे हैं जो अब तक उनकी दृष्टि में देशद्रोहियों ने किया था। बल्कि उनसे भी अधिक हिंसक और क्रूर तरीके से कर रहे हैं। क्योंकि उनके पास सत्ता है, धर्म है, समाज है और मरने कटने को तैयार नागरिक भी। भारतीय समाज ने कभी भी अपने हितों को लेकर या फिर अपने प्रति हो रहे अन्याय के विरुद्ध कभी घोर विद्रोह नहीं किया है तो उसका कारण धर्म के वह सिद्धांन्त ही हैं जिन्होंने हिन्दू समाज को भीरु, सहनशील और सर्वस्वीकारवादी बना दिया, जिसके कारण वह दुनिया में सबसे पिछडा और जाहिल बना रहा है। दूसरे नम्बर पर मुस्लिम धर्म आता है जो अपने बेढंगे नियमों और कूप-मंडूपता के कारण पिछड़ा बना रहा। भारत में जब भी सत्ता के विरुद्ध आन्दोलन हुए भी तो विरोधी सत्ताओं के द्वारा ही किये गये, जिसमें आम आदमी को शामिल भर किया गया। लेकिन सत्ता मिलने के बाद दूसरे लोगों ने भी वही किया जो पूर्ववर्ती सत्ताएं करती रही हैं। ऐसे अंधकार के दौर में कुछ राहत समाज सुधारकों ने जगाए रखी है और हमारे पर्वों ने मरणासन्न मनुष्य को अपने दायरे में खुशियां मनाने की झूठी तसल्ली दे रखी है। अब दीपावली का पर्व आ रहा है जिसे पर्वों का समूह भी कहा जाता है। नौदुर्गा, दशहरा, शरद पूर्णिमा, करवाचौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज और छठ पर्व जैसे उत्सवों का समूह सितम्बर के अंतिम सप्ताह में शुरू होता है और पूरे अक्टूबर चलेगा। इन सभी त्योहारों को सरकार के माध्यम से आए बाजारों ने अपने कब्जे में ले रखा है, उनकी पहुंच घर-घर में है और वही तय करेंगे कि कौन से दीप जलेंगे, कौन सा त्योहार कैसे मनाया जायेगा? आज यह सब बाजार तय करता है और नागरिक तो उसकी हाँ में हाँ मिलाने को मजूबर भर हैं। ऐसे भीषण कालचक्र में फंसे हुए हम भारतीय मनुष्य जो कहीं से भी मनुष्य नहीं रहे, उसे दीपोत्सव की बधाई देते हुए कलेजा कांपता है, फिर भी हम विवश हैं बधाई देने के लिए, अपने बच्चों और अपने परिवार के साथ आप लोग दीप जलाएं और उत्सव मनाएं, अपने साथ, अपनी आत्मा के साथ। अन्तर के उजाले की बधाई, शुभकामनाएं।
-मनोज अनुरागी