नई चुनौतियां नए संघर्ष

-मनोज अनुरागी
देश के हालात कभी किसी से छिपे नहीं रहे हैं, सबको दिखाई दे रहा है और सभी देख रहे हैं। घटना आजकल की नहीं है, ये तो आजादी से पहले और उसके बाद निरन्तर जारी है, घट रही है। वो जो मर रहा है गाँव-गाँव में, गली-गली में… सदियों से मर रहा है, खट रहा है दो जून रोटी के लिए। अपने खून-पसीने से जो बनाता है किसी भी राष्ट्र और समाज की तकदीर, लेकिन उनकी तकदीर में लिख जाता है वही फटी धोती, चीथड़ों से सजी ज़िन्दगी और मेहनत की चक्की में पिसा हुआ, निचोड़ा गया तन और मन। यह हकीकत है हमारे देश की और हमारे हुक्मरां….जिन्हें दिखाई नहीं देता अपनी गोदामों में भरा हुआ लाखों टन अनाज। जिन्हें दिखाई नहीं देती वो मरणासन्न-पिलपिली जिन्दगी और सड़ते हुए अनाज के मध्य कंपकपाती हुई जिन्दगी। ये भूखे नंगे लोग चिल्लाते रहेंगे और हमारे देश के हुक्मरां खूंख्वार लोग जिन्दगी का भाव लगाते रहेंगे। नेताओं के बयानों से बाजार के दाम बढ़ जायेंगे, क्योंकि वो दाम बढ़वाने की बसूलते हैं बड़ी कीमत। लाखों टन अनाज गोदामों में सड़ जायेगा और देश में लाखों भूखे मजदूर अपने परिवारों के साथ मौत को गले लगाते रहेंगे। उन पर खूब राजनैतिक रोटियां सेंकीं जायेंगी, क्योंकि वो गरीब की चिता है। गरीब की चिता भी इन हुक्मरानों की ऐय्याशियों के लिए इनके उपभोग की सामग्री को भूनने के काम आयेगी। लेकिन सोचा, यदि यही भूखे नंगे लोग अपनी महान संस्कृति जिसे धैर्य कहते हैं, उसके घेरे को तोड़कर सड़कों पर निकल पड़े तो ये हुक्मरां अपने करोड़ों सुरक्षा कर्मियों के द्वारा भी सुरक्षित न रह पायेंगे। एक तरह से देखें तो देश के चारों ओर यह आग बहुत तेजी से फैल रही है, जिसे हम गरीबी कहते हैं। इस गरीबी से उपजा हुआ आक्रोश भी दुनिया देख रही है, लेकिन देखकर भी वो अंधे बने हुए हैं, यह उनका ही दुर्भाग्य है। आखिर ये शासनकत्र्ता इतने बड़े पैमाने पर कमाई हुई दौलत का करेंगे क्या? यह बड़ा प्रश्न है मानवता के लिए! आजादी के सात दशक के बाद भी हम देश के 70 प्रतिशत नागरिकों को जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं मुहैया नहीं करा पाए हैं और आज प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ रहा है कि देश के 80 करोड़ लोगों को पांच किलो अनाज दिया जा रहा है, क्या यह सत्ता की असफलता नहीं है? इससे बड़ी और शर्म की बात क्या होगी? कुछ व्यापारियों, कुछ नौकरशाहों और नेताओं के सिवा देश की अधिकतर आबादी जीवन की बुनियादी सुविधाओं के लिए भटक रही है। लाखों करोड़ रुपया भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है, लेकिन देश का विकास न जाने किस सदी का इंतजार कर रहा है। हम अपने छोटे से राज्य उत्तराखण्ड में ही देख रहे हैं कि हजारों करोड़ रुपया भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है, बेलगाम नौकरशाही के सामने अनुभवहीन असहाय नेता अपनी ही जनता का गला काटने में लगे हुए हैं। बजट को बढ़ाया जा रहा है, लेकिन विकास न के बराबर, कहीं न दिखाई देने वाला। आपदाओं से घिरा पहाड़ बस अपने हालात पर आँसू बहा रहा है और नेता व नौकरशाही मजे ले रहे हैं। इस स्थिति से राज्य और देश को उबारना है तो जन साधारण को फिर से उठ खड़ा होना होगा, एक नए संघर्ष के लिए, जैसे वो उठा था देश की आजादी के लिए, कभी राज्य आन्दोलन के लिए। नई पीढ़ी के सामने नई-नई चुनौतियां हैं और उनसे बाहर निकलने के धुंधले रास्ते हैं। इन रास्तों पर संघर्ष की मशाल जलानी होगी।