कुछ अन्तर तो है
कहना मुश्किल है कि इस मार्ग पर चलने के अपने ही खतरे हैं। जिन्हें समझ पाना उस व्यक्ति के लिए असंभव ही है जिसने कभी सत्य के बारे में सोचा ही न हो। बचपन के दिनों में तो सभी सोचते हैं और प्रकृति के इस खेल को देख-देखकर आश्चर्यचकित होते हैं। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होने लगते हैं और संसार का रंग उनके ऊपर तारी होने लगता है, वह भूलने लगते हैं कि उनके जीवन में भी सत्य के फूल खिले हैं। उनकी सौरभ भी बिखरी है, उनके उस आश्चर्य में जो उन्होंने अभी-अभी जिया है। जिससे वह निरन्तर भाव विभोर हो रहे हैं अभी तक। लेकिन धीरे-धीरे वह देखते हैं इस संसार के कार्य व्यवहार जिसमें एक सहजता सी उन्हें लगती है। उन्हें लगता है कि कोई भी तो कौतूहल से भरा नहीं है। सब के सब एक सीधी रेखा पर चले जा रहे हैं। कोई भी प्रकृति को देखकर आश्चर्यचकित नहीं होता है। कोई भी सवाल नहीं करता है। आखिर यह सब क्या है? हालांकि यह अलग बात है कि जिसे बच्चा सीधा और सरल मान बैठता है, वह उसके लिए उतना ही जटिल निकलता है जब वह उनके मार्ग पर चलना शुरू करता है। वह सीखता है कि लोग सहज ही पढ़ते हैं, नौकरी करते हैं, व्यापार करते हैं और शादी-ब्याह करके बच्चे पैदा करते हैं। यह उसने देखा और सीखा है। लेकिन बहुत ही जल्दी उसका भ्रम टूटने लगता है। जब वह समाज के सहज नियमों पर चलने की कोशिश करता है। बोझिल अकादमिक जीवन और उसकी परेशानियां जब उसके सामने आती हैं तो एक बार तो उसका मन खिन्न होता ही है। यह क्या है? किताबें रट-रटकर परीक्षा देना और उस परीक्षा के आधार पर नौकरी पाना। नौकरी पाकर भी क्या करना है? वही घिसे-पिटे काम जिनका कि एक ढांचा होता है। सांचे में ढ़लकर जिसने उस सांचे के सभी नियमों का अक्षरशः पालन किया और करवाया वही समाज के लिए आदरणीय बना! यह भी कोई जीवन है? लेकिन समाज का यही जीवन है और हर इंसान इसी में मजे लेता है। उसे लगता है कि वह समाज के निर्माण में कोई बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है।
इससे इतर कई लोग समाज को सुधारने का काम करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि उनसे बड़ा काम तो कोई कर ही नहीं सकता है, वह समाज की नजरों में महान बनने के लिए क्या-क्या नहीं करते हैं। अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं और चाह केवल इतनी ही कि समाज उन्हें महान बना दे। यह भी मार्ग है। एक यह भी है कि कोई व्यापार करे, दलाली करे। करोड़ों-अरबों रुपया कमाए और दिन-रात रुपया-रुपया करता रहे, जैसे भिखारी और गरीब करते हैं। दोनों में कोई बुनियादी अन्तर नहीं है लेकिन कुछ अन्तर तो है।
-मनोज अनुरागी